ऊपर दिखा एक, झुकी हुई सी छत, काला सा था, पर उसमे रास्ते भी थे, समय बिता, नजर ऊपर हुई, लेकिन वो छत, धीरे धीरे नीचे आती रही, एक समय था, जब जमीन और उसकी ऊंचाई, का फर्क शून्य था, और वही से शुरुवात हुई, वो दिवारे फिर से उठने लगी, समय का बदलाव था,Continue reading “एक घर”
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कामयाबी
जब भी ऊपर की और जाता हूं,वो हर एक कदम सीढ़ियों पर,मानो यह बता रही हो,कि काफी आगे आ गए हो तुम।यह वही जगह थी जहां कभी,जलावन का मचान होता था,वो बोरी में भुस्सी का होना,वो कोने में रखे वो काला सा चूल्हा।आज इन सफेद दीवारों पे,जब हाथ फेरते हुए कदम को आगे रखते है,लगताContinue reading “कामयाबी”
