असली दुश्मन: Real Villian
उठ जा ए बंदे, काहे सो रहा है तू,
किस मंजिल को जाना है, अभी भी खोज रहा है तू।।
ऐसी क्या नादानी जो आज भी समझ न सका,
क्या पाना है जो अभी तक बूझ न सका।।
जितना देखा इस दुनिया को, लड़ाई सिर्फ एक से है,
कितना भी भाग लेकिन भिड़ना उस एक से है।।
क्यों आज भी इतना बेबाक सा पड़ा है,
जैसे वो तुझे रोक रहा और तू थम भी रहा है।।
उसने ही तो सुदामा को दबोचा, उसने ही तो पांडवो को खींचा,
वो ही तो है जो सपनो को साकार होने से रोकता।।
वो ही असली मलाल है, जिससे यह जग त्राहिमाम है,
क्या तू अब रोक पाएगा उसको, जो दरिद्रता की पहचान है।।
अब नही किया तो ना कर पाएगा, तू उस एक को ना हरा पाएगा,
उठ चल, भाग और रौंद उस एक को, सोचना भी क्या अब तू ही करेगा।।
है हिम्मत तो ललकार उसे, दे उसे चुनौती उसके विनाश की,
जा उजाड़ दे उस हैवान को, दे मिटा उस एक “गरीबी” के निशान को।।
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