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ऊपर दिखा एक,
झुकी हुई सी छत,
काला सा था,
पर उसमे रास्ते भी थे,
समय बिता,
नजर ऊपर हुई,
लेकिन वो छत,
धीरे धीरे नीचे आती रही,
एक समय था,
जब जमीन और उसकी ऊंचाई,
का फर्क शून्य था,
और वही से शुरुवात हुई,
वो दिवारे फिर से उठने लगी,
समय का बदलाव था,
अब नई छत झुकी नही थी,
समान थी, स्थिर थी,
वो बेटा जो था,
जो पिता के बचे,
सपने को पूरा करने लगा था,
वो अब संभलने लगा था,
आज भी उस जगह,
दीवारों को सजाने का काम होता है,
नई चकाचौंध याद दिलाती है,
यही तो अपना एक घर है।